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Tuesday, September 4, 2012

बेटी- प्रीति‍ प्रि‍या झा


प्रीति‍ प्रि‍या झा, पि‍ता- श्री वि‍जय चन्‍द्र झा, माता- श्रीमति सीमू झा, न्म ति‍थि‍- ०१.०३.१९९४, सम्‍प्रति‍- छात्रा कथा १२, केन्‍द्रीय वि‍द्यालय टाटा नगर, आवासीय पता- गोलपहाड़ी मेन रोड, गायत्री मंदि‍रक नि‍कट, जमशेदपुर, पैतृक गाम- धनखोरि‍, फुलपरास, मधुबनी मातृक-  घोघरडीहा, मधुबनी
बेटी
जन्‍मकाल, आमक मज्‍जर
खुशीक पेटार
घरक लक्ष्‍मी बेटी
मुदा मंचेटा पर
सभ कहै छइ बेटी-बेटा एक समान
तँ कि‍अए दुख मनबैत छी
कन्‍याक जन्‍मपर
कि‍अए नै जन्‍माल जाइ छइ बेटी
एकटा पुत्रक आशामे
सात-सात बेटी
ककरो तनपर साफ वस्‍त्र नै
मुदा एकटा बेटा-
वएह- बौआ, बाबू, सुग्‍गा-नूनू
दोष ककरा देल जाए?
सबहक मति‍मे पुत्रमोह, ति‍लकक लोभ
ककरो मति‍ तँ बदलल नै जा सकैछ
बाप बेपारी आ बेटा वस्‍तु बनि‍
बजारमे पसरल अछि‍
बि‍कबाक लेल तैयार
चाम-मोट मुदा दाम चमनगर
जखन बेटीक बाप- तखन कनैत छी
मुदा! जखन बालकक पि‍ता
तँ भगवानक समान आदर चाही
बेटी सभ मारल जाइ छै
नीके हएत, बेटी खतम भऽ जाएत
रहि‍ जेता सभटा बालक कुमारे
प्रकृति‍केँ चुनौती दि‍अ?
वाह आर्यावर्तक पूत!! 
    

प्रेम- पवन कुमार साह,


पवन कुमार साह, जन्‍म– ०२.०२.१९८७, पि‍ता- श्री वासुदेव साह, गाम- खाप, पोस्‍ट- अन्‍धारवन (वासुदेवपुर), थाना- लाैकहा, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार)शि‍क्षा- एम.ए. (अंग्रजी), एल.एम.एन.यू, दरभंगा
प्रेम
की पाप छल प्रेम हमर
की गुनाह छल प्रेम हमर
लगि‍ गेल कि‍ए एकरा एहेन नजरि‍
की पाप छल प्रेम.....
 जौं प्रेम पाप छी तँ
ई पाप हम करबे करब
कि‍यो मि‍लए ने दि‍अए चाहैए हमरा
मुदा हम ओकरासँ मि‍लबे करब
सभ कि‍छु ओकरा लेल मेटा गेल हमर
की पाप छल प्रेम......
सुनि‍ लि‍अ यौ प्रेमक दुश्‍मन
मि‍लैसँ हमरा नै रोकू
कऽ देलौं ओकरे न जीवन
हमरा आब कि‍यो ने टोकू
व्‍यर्थ भेल जि‍नाइ जि‍नगी हमर
की पाप छल प्रेम..... 

स्वाती शाकम्भरी -पिताजी



पिताजी वर्तमान दुनियाँ चाँद पर
मुदा अहाँ मचान पर बैसल
हमर भविष्यक चिंता कि करै छी
हमर भविष्य हमरे पर छोड़ि दि
आबो अपन अनरगल सोच सँ मनकेँ मोड़ि लि
नारी आब अनाड़ी नै
दुत्कारल कोनो भिखाड़ी नै
हम दबल कुचल कौनो अबला सन
रक्षक केर बाट निहाड़ी नै
हम स्वयं लड़ब ओइ दानव सँ
ममता विहीन ओइ मानव सँ
जे नारीत्व धर्म केर शोषक छै
कोमल भावक भक्षक छै
हम विवश वीरक वनिता नै
हम दुःखीता द्रौपदी सीता नै
हम रणचंडी दुर्गा काली छी
दानवीय भाव संहारी आ मानवीय सकल प्रतिपाली ।

स्तुति नारायण -मन पड़ैत अछि...



मन पड़ैत अछि पोखरि-झाखरि,
अपना गामक बान्ह
अपना गामक खेत-पथार
टेढ़-मेढ़ ओ बाट
मन पड़ैत अछि महमह गमकैत,
मोजरल आमक गाछ
भोर अन्हारे महु बिछि आनब,
लोढ़ब फुल-बेलपात
मन पड़ैत अछि लुधकल जामुन,
लीची, बैर, अनार
आमक कुच्चा, सागक मोचरा,
इमली आर अचार
रनै-बनै कत फिरै छँ,
माक झिड़की डा
चल सभ बच्चा कलम चलै छी
पिताक सहज दुलार
टोला परके धिया पुता आर
कलमक ऊँच मचान
गप-सप आ हसी-सी मे
सीखब जीवन पाठ...

अन्तिम क्षणमे- रवि मिश्र “भारद्वाज”,


रवि मिश्रभारद्वाज, पिता श्री पशुपति मिश्र, गाम- ननौर, जिला- मधुबनी।
     अन्तिम क्षणमे
काल्हि किछु काल असगरेमे
हम केलौं अपनासँ किछु बात
पुछलौं अपनासँ बिना मतलबक
की ककरो तोहर छौ आस
कियो नै भेटल जे चाहितै, सुनितै
हमरासँ हमरा भाव-विभोर कऽ,
चाहलक तँ सभ कियो हमरा,
मुदा नै देखलक हमर आँखिक नोरकेँ
बेचैन भऽ कऽ कानए लागल
हमरेपर जखन हमर आँखि
हँसि कऽ लोक हमरा देखऽ लागल
ऐ उमरोमे एना
कि कियो देखावा कऽ सकै छै
हँसऽ लगलौं हमहूँ हुनका देखि कऽ
दुख अपन हँसीमे नुका कऽ

टनका/ हाइकू/ शेनर्यू- बृषेश चन्द्र लाल


बृषेश चन्द्र लाल, जन्म २९ मार्च १९५५ ई. केँ भेलन्हि। पिताः स्व. उदितनारायण लाल,माताः श्रीमती भुवनेश्वरी देवी। नेपालमे लोकतन्त्र लेल निरन्तर संघर्षक क्रममे १७ बेर गिरफ्तार। लगभग ८ वर्ष जेल। सम्प्रति तराईमधेश लोकतान्त्रिक पार्टीक राष्ट्रिय उपाध्यक्ष । माल्हा- कथा संग्रह, आन्दोलन- कविता संग्रह आ बी.पी. कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास मोदिआइनक मैथिली रुपान्तरण तथा नेपालीमे संघीय शासनतिर नामक पुस्तक प्रकाशित। विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीति अनुयायी आ नेपालक प्रजातांत्रिक आन्दोलनक सक्रिय योद्धा छथि।

टनका
मरब अहाँ
जीअत लौसँ रक्त
चूसएबला
अहाँ मुरझाएब
आ ओ अमरबेल!!

हाइकू/ शेनर्यू
लैअ छाल/ लोक हरियरीकेँ/ जारनि लेल
नभ आ धरा/ शिव-शक्तिक मेल/ सृष्टि हएत
सटल शान्त/ चूसैत छै छातीकेँ/ अमरबेल
हे, अनन्तोकेँ / अस्तित्व बोध लेल/ चाही किनारा!
गवाह ठूँठ/ अपने पैरपर/ कुरिहरिक!
दिव्य सन्देश/ क्षितिजसँ अनं/ अस्तित्वकेर!
हवामे कल्पनाक/ रैड़ा/ चरैअ घोड़ा!
आनि कऽ आश/ सोझाँमे फुसलाए/ धरैअऽ घोड़ा!
आशे तँ छैक/ जीवन जगतमे/ कहैअ घोड़ा!
र्वर भूमि/ श्रम आ पसीनासँ/ गर्भाइत छै!
कृत्रिमतामे/ आदिवासी आनन्द?, किन्नहुँ नइ!
नेने छै पानि/ बेबूझ लोक लेल/ भू खोइछमे।
साँझ आ भोर/ शुरुआत आ अन्त/ शान्त रंगीन!
दैत्यक खोड़र/ जल जीवनाधार/ सृष्टिक खेल!
गन्हा जाइछ/ घेराएल समुद्रो/ थुनएलासँ!
ढहनाइत/ मुदा गर्वे आन्हर/ अछि मिथिला!
बेवकूफ छै/ मस्त बेफिक्र एना/ मनुख लेल!
सटले लग/ पिआसल दू मोन/ मिलन लेल।
प्राणदायिनी/ पिघलैत सिंचैत/ फटैत धरा।
धुआँइत छी/ पानि छातीक ताओ/ भफादैअए।
जलमे मुदा/ कोँचल आगि खाली/ ठंढएतैक?
कतेक उड़ू/ कसाक हाथसँ/ शान्तिक नामेँ।
खिन्न छै शान्ति/ अशान्त दुनियाँसँ/ कते उड़ओ!
भरल पेट/ शान्त रखैत अछि/ बाघो सिंहकेँ।
धूर्त आ लोभी/ भेटत नुकाएल/ चुप्पे सोन्हिमे।
ड़ाभिसप्त/ गति लेल निर्मल/ प्रतीक्षारत।
देखह लोक/ बलत्कृत प्रकृति/ शान्त आ चुप।
शान्त करेज/ अछि र्जावाहक/ कोटि नमन।
भाफए हिम/ धरतीक तापसँ/ सोचू मानव
उठलै मेघ/ भुइयाक जहर/ खंगहारए।
चिन्तित शिव/ आधुनिक माहुर/ कोना गिड़थु?!
टोनि रहल/ कटानक हिसाब/ धौआ झड़तैक।

शासक लोकनिसँ (बाढ़िक सन्दर्भमे)- मनोज कुमार झा


मनोज कुमार झा, न्म- ०७ सितम्बर १९७६ ., दरभंगा जिलाक शंकरपुर-माँऊबेहट गाममे। शिक्षा - विज्ञानमे स्नातकोत्तर। लेखन: विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकामे कविता-आलेख प्रकाशित। चॉम्सकी, जेमसन, ईगलटन, फूको, जिजेक इत्यादि बौद्धिकक लेखक अनुवाद प्रकाशित। एजाज अहमदक किताब रिफ्लेक्शन ऑन ऑवर टाइम्सक हिन्दी अनुवाद प्रकाशित। सराय/ सी. एस. डी. एस. लेल विक्षिप्तों की दिखनपर शोध।
 शासक लोकनिसँ (बाढ़िक सन्दर्भमे)
फूसि कहै छी -
बाढ़ि प्राकृतिक कोप थिक ।
वस्तुतः ई;
हमरा सभक सीना पर दागबा लेल
तोड़बा लेल हमर सबहक आत्मबल कें
लूटबा लेल हमर श्रम सिंचित संसाधन
अहाँ सभक शस्त्रागारक बेस जोरगर तोप छी ।
किन्तु जानू,
भूख लगला पर मनुख टूटबे टा नैरै छै,
लड़बो करै छै,
कते एफ.सी.आइ, कते बाजार समितिक
दुर्गद्वार तोड़बो करै छै।
रक्त केर जे बिन्दु खसै छै धरापर
ओ कतेको स्वप्नदर्शी रक्तबीज रचबो करै छै,
कोनो राजा, कोनो रानी
कोनो जैक वा कोनो जोकर
डरा क वा हँसा क
कतेक दिन धरि
लाखो करोड़ो पृथ्वी संततिकेर्तव्यपथसँ विमुख राखत।

चूड़ा दही बेसी खेला सँ
शोणित ठंढ़ा कतौ भेलैए!
मानि ली, ई बात सत्यो
सत्य त इहो छै विज्ञानसम्मत
वस्तु जे जतेक ठंडा
वातावरण केर तापक असरि ओकरा पर
ओतबिये बेशी पड़ै छै।

तैं कहै छी कान दी
गंगा, कोसी, कमला केर संतति सभक हुंकार दिस
तात्कालिक लाभ-हानिक छोड़ि चिन्ता
आक्रोश-प्लावित भेला सँ पूर्वहिं
शासक लोकनि बाढ़िक निदानक करथु चिन्ता
लोक सभ चहुँ दिस कहै छै।
फुसि कहै छी
बाढ़ि प्राकृतिक कोप थिक।

शांतिलक्ष्मी चौधरी- बथुआक तीमन

शांतिलक्ष्मी चौधरी, 

बथुआक तीमन

मिथिला बाधक अनेर मोथा-बथुआ,
शहरी तरकारी बजारक अनमोल!
जर-जजातक हरमुठ हरमादी,
पौष्टिक आहारक छथि सिरमोर!!

गामक भनसाघरक चीज अनुप,
परदेसी धीयापुताक किलोल!
केहनो मरल भुख केँ जगा दिए,
आमील देल बथुआक सग्ग्भट्टा झोर!!

शांतिलक्ष्मी चौधरी- तिलकोर


श्रीमति शांतिलक्ष्मी चौधरी, ग्राम गोविन्दपुर, जिला सुपौल निवासी आ राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय, सहरसा मे कार्यरत पुस्तकालयाध्यक्ष श्री श्यामानन्द झाक जेष्ठ सुपुत्री, अओर ग्राम महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला सहरसा निवासी आ दिल्ली स्कूल ऑफ इकानोमिक्स सँ जुड़ल अन्वेषक आ समाजशास्त्री श्री अक्षय कुमार चौधरीक अर्धांगिनी छथि। प्राणीशास्त्र सँ स्नातकोत्तर रहितो शिक्षाशास्त्रक स्नातक शिक्षार्थी आ एकटा समाजशास्त्री सँ सानिध्यक कारण आम जीवनक सामाजिक बिषय-बौस्तु आ खास कऽ महिलाजन्य सामाजिक समस्या आ प्रघटनामे हिनक विशेष अभिरूचि स्वभाविक।


तिलकोर
छी विदेह बाड़ीक ई अखंड सोहाग भाग
मिथिला-संस्कृति पर पलरल अमरलत्ती
घरक पछुआर मे ओहिना कचरैत भेटैत
तरूआ पातक तिरहुतिया तिलकोर लत्ती

बलबूतबला महराजा दरभंगा होइ
कि गाम समाजक किओ कमजोर
सभक लिलसा पुरेबाक उदार-दानी
भरि साल सुलभ रहताह ई तिलकोर

चौका मे तरूआ अल्लुक होइ आकि
कदीमा फूल, तग्गर, कुम्हर-सिस्कोढ़
रमतोरइ, भाटा, वा कि मिरचाइ होइ
बुझु सछै सुन्न बिन एक तिलकोर

गरम गरम करूगर माछक तीमन होइ
की कबकब ओल, बूटक-बड़ी, कुम्हरौड़
हक स्वाद तखने शोभउत्तम सन
जखन संग उपलब्ध होइ एक तिलकोर

सुन्दर हींग देल कदीमाक तरकारी होइ
वा कि सरिसौं देल अरिकंचनक झोर
चिकना देल सजमैन खाहे केहनो बनै
सभक सुलाज राखै छथि एक तिलकोर

समधि, जमाय सन गरिष्ठ पाहुन होइथ
वा कि मुहलग्गू भौजीक भाय मुँहचो
मामा, मौसा, पीसा, सभक सुमान अधुर
पाहुन केँ जँ नै परसलिगरम तिलकोर

गरम गरम लोहिये मे तरूआ टुभटुभ
सुगंधे सँ मोन मे होत रहत हिलकोर
मिथिलावासीक छैक ई खोज अनुप-सन
नै पता मिथिला ऐला कोना ई तिलकोर

नीम-हकीमी के तँ आब गप्पे छोड़ू
आब तँ पहुँचलाह ई एम्स आरोग्य
बड़का पढ़लका एम.डी. केर कान काटै
बाड़ी-बैसल चीनीक डाक्टर ई तिलकोर


सोधनपाल- डा.अरुण कुमार सिंह



डा.अरुण कुमार सिंह, सम्प्रति मैसूर।
सोधनपाल
एकटा छथि गोपाल
गोपाले सन मस्त
रंगो गोपाल सन
स्वभावो छन्हि बएसानुकूल
पढबाक नाम पर छथि प्रतिकूल
जैताह नीक स्कूल
लिखताह नै पढ़ताह
मारि धरि खौताह
तैयो बिहुँसल
स्कूलसँ घुरताह
एक दिन अनचोकेमे
दलानक बगलेमे
लागल लारक ढेरीमे
लगोलन्हि सलाइसँ आगि
भऽ तँ जाइत जुलूम
मुदा कौहुना आगि मिझाओल गेल
सौंसे गौआँक नजरिमे
गोपालसँ भेलाह सोधनपाल।

हमर प्रियतम !- राहुल राही



राहुल राही, पिता- श्री हरिश्चंद्र झा, गाम- माऊंबेहट, मनीगाछी, दरभंगा, स्थायी निवास - दरभंगा, बिहार, वर्तमान निवास- सेलम, तमिलनाडु।

हमर प्रियतम !

प्रियतम ! अहाँ कतेक नीक छी।
कतेक विश्वासी आ अपन कहल पर सटीक छी,
कि हम आँखि बंद कए,  कऽ  सकैत छी
अहाँ पर विश्वास।

कि जहिना पछिला जन्म मे,
ओकर पछिला जन्म मे,
आ जन्म-जन्मान्तर सँ हर जन्म मे,
अहाँ हमरा सँ भेंट करैत एलौं,
अपन वचनक अनुसार,
आ हमरा मिलाबैत एलौं,
ओइ परम आनंद सँ,
जतए कोनो दर्दक अनुभूति नै रहि जाइत छै,
कोनो अपूर्ण इच्छाक टीस नै रहि जाइत छै,
एकटा तृप्ति होइ छै जीवनकेँ जी लेबाक,
आ संतुष्टि होइ छै अहाँकेँ पाबि सभ किछु बिसरि जेबाक।

जेना अहाँ कहियो हुसलौं नै अपन वचन सँ,
जेना अहाँ कहियो भटकलौं नै अपन कर्त्तव्य सँ।

ओहिना
जखन कोनो अप्पन कऽ बिछड़बाक दुःख गहींर उतरि कऽ करेजा मे भूर करए लगै,
जखन ककरो उपकारक कर्ज मन-ओ-मस्तिष्क केँ अपना बोझक निच्चा दाबि मरदए लगै,
जखन ककरो वचन दऽ अंतिम समय पर नै भेंट कऽ पेबाक टीस अपराध-बोधक आगिमे जराबए लगै,
आ जखन ककरो लेल किछु करबाक प्रेममय तीव्र इच्छा दम तोड़ि मिसिया-मिसिया कऽ मरबा लऽ बाध्य करए लगै,
तखन अहाँ आएब आ हमरा सम्हारि लेब,
देखू हमरा तिल-तिल कऽ मरए नै देब।

हमरा विश्वास अछि,
अहाँ आएब आ हमरा सम्हारि लेब,
अहाँ हमरा मिसिया-मिसिया मरए नै देब।

किएकि
हमर तँ जिजीविषाक श्वास-नलिये टूटि गेल छल,
तखन सँ अहींक देल भरोसाक साँस पर तँ जीबि रहल छी।
कतेक अहाँक प्रशंसा करू,
कोना अहाँकेँ धन्यवाद कहू,
किछु बुझबामे नै आबि रहल अछि,
मुदा अहाँ समय सँ आबि जाएब,
देखू, आबै मे देरी नै लगाएब।

हे हमर प्रियतम!
हे हमर मृत्यु!

जवाहर लाल कश्यप- खाइ



जवाहर लाल कश्यप (१९८१- ), पिता श्री- हेमनारायण मिश्र, गाम फुलकाही, दरभंगा।  
खाइ
एकटा लड़की छै
लडकी नै, परी छै
रंग ओकर दूधमे केसर मिलाएल
नैन ओकर रुपमे अछि ओझराएल
होइत अछि मोन
ओकरा सँ करी बात
बहुत रास मीठ मीठ बात
मुदा हिम्मत नै भेल
ओहो हमरा रोज देखैत अछि
देखि हँसैत अछि
किछु कहि दैत अछि
मुद हम  किछु कहि नै सकलौं
रहैत अछि हम्मर बिल्डिंगमे
हम्मर बिल्डिंग
जे हम्मर नै अछि
हम ओइ बिल्डींगमे वाचमैन छी
ओतेक टा बेटी अछि हम्मर
रहैत अछि गाम मे
माय आ बुढ़ी दायक संग
हम अप्पन परिवारसँ दूर
परदेसमे
पेटक आगिमे
सभ सुख होमादि कऽ
जीने जा रहल छी
आबैत अछि वएह लड़की
लेने एकटा गुड़िया
कहैत अछि मीठ बोल
“अंकल देखू नेन हमर डॉल
कते नीक अछि
दस हजारक अछि”
ओतेक सैलरी नै अछि हम्मर
हम ओकरा छू नै सकलौं
गोदमे उठा नै सकलौं
जइ खाइकेँ
देवदूत पार कऽ चुकल
हम ओकरा पार नै कऽ सकलौं

सत्यनारायण झा- पत्र




लिखि रहल छी आखर हम, प्रिये अहींक नाम
गेल छलौं पूजा मे, हम अपना गाम।१
गामक माटि छलै, ओहिना गमकैत,
फूल पात सभ गाछमे, छलै ओहिना झुलैत।२
छौड़ा सभ गाछ पर, झूला झुलैत छल,
सिनेह-प्रीतिक गीत सभ, ओहिना गबैत छल।३
यारक दलान एखनो पूबे मुँहे छल,
बाबाक आँगन, सुन सान लगैत छल।४
एकोटा लोक नै, एकोटा बेद नै,
साँझे सँ अंगनामे कुकुर भुकैत छल।५
की कहू हाल हम, भैया भउजी केर,
बेटाक मारि सँ, बेदम रहथि फेर।६
गामक हालात छैक एकदम खराब,
टोले टोल भेटत आब बोतल शराब।७
नै छलै ब्रह्मस्थानमे ओ पाकरिक गाछ,
नै छलै ओकरा आब, वरक गाछक साथ।८
महराजी पोखरिक छैक, आब हालत बेहाल
घाट सभ टुटल छैक, रूप विकराल।९
आँगनमे आब, एकटा हवा बहल छै,
सबहक पुतौहु आब, रौदा तपैत छै।१०
बाध बोनक हाल एखनो हरियर लगैत छैक,
घास काटए एखनो घसविहनी भेटैत छैक।११
देखलौं आँगन मे, गबैत सामाक गीत,
पोखरिक मोहार पर, भेटल छला मीत।१२
कहलनि भजार, अहाँ काज कएल नीक,
गाम आबि गेलौं से, भेलै बड़ ठीक।१३
की कहू हम आब, गामक कथा,
लिखि नै सकै छी, गामक व्यथा।१४
माफ करब अहाँ हम, घूमि नै सकब,
गामक हालात जावे, किछु नै सुधरत।१५
मोन हुअए तँ गाम, अहूँ आबि सकै छी,
गामक सुधारमे, संग दँ सकै छी।१६

निक्की प्रियदर्शिनी -समाजक प्रश्न ?



समाजक प्रश्न स्त्रीक कतेक सीमा?
आब तँ भेल आब कतेक आगाँ?
की आब बना देबैक अमेरिका आ इंग्लैण्ड?
मुदा कहाँ बदलल अछि मानसिकता?
स्त्रीकें देखक, व्यवहार करइक,
अहाँ स्त्री छी ई एहसास सदिखन,
कहाँ बदलल अछि।
देखला सँ की होइत अछि ?
आ देखला सँ की भऽ जाइत अछि?
एकर अतिरिक्त,
उचित व्यवहार, उचित स्थान,
कहाँ देल गेल अछि?
जरूरत बुझि पड़ैत अछि?
समान अधिकार, समान महत्व आ समान प्रेमक,
कतए?
समाजमे कागज पर नै।

निक्की प्रियदर्शिनी- मन्तव्य



निक्की प्रियदर्शिनी, सम्प्रति भागलपुर।
मन्तव्य
व्यापार आ शिकार असगर करी,
आदर आ उपकार सभक करी,
प्रेम आ कल्पना मनसँ करी,
कपट आ छल कखनो नै करी,
कष्ट आ दुःख मे संयमसँ रही,
खेत आ खरिहान मे काते-कात चली,
विचार आ खण्डन अवश्य प्रकट करी।