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Tuesday, September 4, 2012

शिवशंकर सिंह ठाकुर- श्रद्धान्जलि


शिवशंकर सिंह ठाकुर

श्रद्धान्जलि

आइ पुनः आएल ई दिवस अछि,
हमर अहाँक आइ मिलन अछि,
आइयेक दिन हम अहाँ एक सूत्रमे बन्हल रही
प्रेमक फूल अहाँक बाड़ीक
हमर जीवनमे आइ खिलल छल ,
आ हमर मिलन सेहो तँ प्रिय
आजुक पावस दिवसमे
कतेको साल पहिने खिलल छल !!!

कतेक बढ़िया छल ओ दिन
आ अहसास हमर मिलनक,
जखन अग्नि केँ साक्षी मानि कऽ,
हम अहाँ आइये प्रणय-सूत्रमे बन्हल रही,
ओ राति किछु खास छल,
चाँदनी मे नहाएल छल,
हमर अहाँक मिलनक गवाह बनल छल !!!

हम समर्पित भऽ गेल रही अहाँक अंकमे ओइ राति,
आ अहूँ तँ अपना आपकेँ हमरा समर्पित कऽ देने रही
प्रेमक रसमे हम दुहु गोटे सराबोर भऽ गेल रही,
ओइ राति हमर दिल कतेक जोड़ सँ धड़कि रहल छल,
आ धौंकनी जकाँ धधकि रहल छल हमर सम्पूर्ण देह,
घाम सँ लथपथ ,एक दोसराक बाहुपास मे सिमटल रही,
ओइ राति हम हम नै रही,अहाँ अहाँ नै रही,
दुहू गोटा एक भऽ गेल रही !!!

हमर बाड़ीक तीनू फूल आइ पैघ भऽ गेल,
कतेक सुन्दर लागि रहल अइ ,
अहाँ रहितौंह तँ देखितौंह आ हमरा चिकौटी काटितौंह,
ई तीनों तँ अहींक 'प्रेम' गाछक फूल अइ,
एकरा देखबाक खुशी कते पैघ होइत छैक ,
से तँ अहाँ बुझबे करैत छी,
एकरा तँ व्यक्त नै कएल जा सकैछ,
ई तँ अव्यक्त होइत अछि,
आखिर मे ई शरीर तँ सेहो स्थूल भऽ जाइत अछि !!!

आइ अहाँ नै छी तैओ हमरा लगैए,
जे अहाँ किम्हरो सँ हमरा देखि रहल छी,
हमर खुशी आइ अपूर्ण लागि रहल अछि,
तैयो हमर खुशीमे मानू अहाँ अपन खुशी ताकि रहल होइ,
आइ हम कतेक असगर लागि रहल छी,
रहि-रहि अहाँक स्मरणमे कोर काँपि रहल अइ,
हमर मोनक भावना केँ कियो अनुभव कऽ सकैछ ,
हमरा लेल आइयो अहाँ ओतबे स्नेहपूर्ण छी !!!

अहाँ दऽ जखन हम सोचै छी,
अहाँक संग बिताएल एक एक क्षण, एक एक पल
केँ स्मरण कऽ कऽ हम प्रफुल्लित भऽ जाइ छी,
कोना कऽ अनझोके सँ हम अहाँ टकरा गेल रही,
अहाँ कनी बेशी तमसा गेल रही,
ओकर बाद तँ हमर अहाँक भेँट-घाँट होइते रहल,
आ हमर अहाँक प्रेम बढिते गेल,
फेर दुहु गोटे प्रणय -सूत्र मे बन्हि गेलौंह !!!

आजुक ई दिन अति पावन अइ,
आब जखन की अहाँ नै रहलौंह,
हम की करू ,आजुक दिनकेँ कोना कऽ मनाउ,
से नै फुरा रहल अछि,
पहिने तँ दुहु गोटा मिल कऽ आजुक दिनकेँ मनबैत रही,
अही दिन केँ विशेष रूप सँ यादगार बनबैत रही ,

ओतेक हिम्मत आब हमरा नै रहि गेल !!!

हम धीरे धीरे आब टूटऽ लगलौंह अछि ,
आब जखन कखनो अहाँक याद अबै अछि
हम चुप्पे सँ कानि लै छी, फेर बच्चा सभ केँ देख कऽ
अपन काननाइ रोकि लैत छी, मोन मे गबधी मारि लैत छी,
भीतर सँ अशान्ते रहैत छी, मोन मे लललाहा आगि के देखैए?
अहाँ तँ सदिखन हमर मोने मे रहब ,
तैयो आइ अहाँक बहुत याद अबैए ,
अकुलाइतो हम चुप छी ,
बुझाइए जे ई चुप्पी हमर साँसक संगे टूटि पाएत ,
मोनक बात मनहि रहि जाएत,
अपन बात आइ एतहि सम्पन्न करैत छी,
आजुक ई कलम अहींकेँ समर्पित करै छी!!!

हमर ई फूल अहाँ स्वीकार करू,
हमर ई नोर, ईएह श्रद्धांजलि अइ,
गलती केँ माफ करैत ,
एकरा स्वीकार करू !!!


भोर भेलै- इरा मल्लिक



इरा मल्लिक, पिता स्व. शिवनन्दन मल्लिक, गाम- महिसारि, दरभंगा। पति श्री कमलेश कुमार, भरहुल्ली, दरभंगा।

भोर भेलै
भोर भेलै,
घरनीक तँ हाल बड़ा बेहाल छै,
तहियो ओ नेहाल छै।
घरनी धुरी छथि गृहस्थीक।
आँखि मिरैत उठि पुठि भोरे,
भनसाघर ओ दौड़ै छथि,
चाय बनाबक छन्हि हुनका,
केतली चूल्हापर चढ़बै छथि,
नास्ता संग तैयार करैत छथि,
दिनभरिक दिनचर्या,
घरनी धुरी छथि गृहस्थीक।
घर भरि कानमे तूर तेल लेने,
एखनो निसभरि सूतल छथि,
पतिदेव आ नेनाकेँ,
जगेनाइ एखैन तँ बाँकी छै,
ऑफिस आ स्कूल भेजबाक,
सरंजाम केनाइ तँ बाँकिये छै,
तहियो भोरतरंगक खुशी,
समेटि आँचर मे बान्है छथि,
घरनी धुरी छथि गृहस्थीक।
जीवनक अइ आपाधापीमे,
खुशीक फूल लोढ़ै छथि,
ओइ फूलक सुरभित मालासँ,
परिवारक बगिया सजबै छथि,
जीवनक शृंगार बसल,
सुंदर हिनक गृहस्थीमे,
संगीतक सुर तान बसल अछि,
मनभावन हिनक गृहस्थीमे,
घरनी धुरी छथि गृहस्थीक!

वाणिक लैस- अक्षय कुमार चौधरी


अक्षय कुमार चौधरी, पिता राजनारायण चौधरी, ग्राम+पोस्ट: महिषी (पुनर्वास आरापट्टी), जिला: सहरसा संप्रति दिल्ली स्कुल आ‌‍फ इकोनोमिक्स मे अन्वेषक आ समाजशास्त्री छथ हिनक "Dowary among the Maithil Brahmins: aspects of Change and contitunity" बिषय पर पी. एच. डी. आओर "Marriage among the Maithil Brahmins" विषय पर एम. फिल. केर अन्वेष काज छन्हि
वाणिक लैस
उत्तराहा कहलथिन दखिनाहा कैं-
रौ, तोरा माटि मे लैस छौ
मुदा वाणि मे लैस नै.
...उत्तराहा? ...दखिनाहा?
वाणिक ऐव तँ ऐव छैक!
...कैव तँ कैव छथि!!
ओलक कब-कब पजै छै
गंगोतिओ माटि-पानि पर!
कोशिकन्हो माटि-पानि पर!!
बोल, भाव, स्वभाव, केर मिठास
कि मोल भेटय बजार मे?
वाणिक लैसक कि मतलब
उत्तर, दखिन, शिक्षा, विदुता सँ!
वाणिक तेख तँ तेख छैक!
... कैव तँ कैव छथि!!

गजल- जगदीश चन्द्र ठाकुर “अनिल”


जगदीश चन्द्र ठाकुर “अनिल, जन्म: २७.११.१९५०, शंभुआर, मधुबनी । सेवा निवृत बैंक अधिकारी। तोरा अनामे -गीत संग्रह-१९७८; धारक ओइ पार-दीर्घ कविता-१९९९ प्रकाशित
गजल

पढबाक मोन होइए, लिखबाक मोन होइए
किछु ने किछु सदिखन सिखबाक मोन होइए

अन्हड़ जे रातिखन एलै, सभ गाछ डोलि गेलै
टिकुला कतेक खसलै बिछबाक मोन होइए

सासुर इनार होइए आ डोल थिकहु हमहू
किछु ने किछु एखनहु झिकबाक मोन होइए

अहा आबि जे रहल छी सुनिकबताह भेलहु
गोबरस आइ आंगन निपबाक मोन होइए

दुइ ठोर थीक अथवा तिलकोर केर तड़ु
होइत अछि लाज लेकिन चिखबाक मोन होइए

कोनो ऑफिसक चक्कर लगबने पड़ै ककरो
ई बीया विचार-क्रान्तिक छिटबाक मोन होइए

आजादीक लेल एखनहु संघर्ष अछि जरूरी
व्यर्थ गेल सभ मांगब छिनबाक मोन होइए

अनिल मल्लिक -गीत


अनिल मल्लिक, बिराटनगर।
गीत
एकटा काल खण्ड, तहि जिलौं हम
यथार्थक हलाहल, एतहि पिलौं हम
मेटायल तृष्णा, यश मान धनक
ओह! क्षुधा कहाँ मेटा, हमर मनक
यतचिक्कन रस्ता, वातानुकुलित अट्टालिका, गतिशील सभ किछु
ओतखरजा, खपड़ा, ड़गर धुपमे ठाढ़ ताड़क गाछ, आर नै किछु
शर्द सीसा, उच्छवाशक भाफ सियाही, गुर अछि कलम
अहिना महिशारीसँ मेलबॉर्न यात्रा, लिखैत मेटबैत छी हम
दिग्भ्रमित उदिग्न मन नै अछि, आब स्पष्ट अछि, करब कि
एहन करब, मातृ ऋण सँ उऋण भजा, बेसी हम कहब कि
विरक्त भल छलहुँ, भेटल दुनियाँ रंग बिरंगी
लहुँ एतहि हुनको, पग पग साथ दैत जीवन संगी
चुपचाप देखैत रहैत छलथि, असगरे अपनासँ लड़ैत हमरा
कि भेलै नै जानि, कखैन ओ थि, देलथि कन्हाक सहारा
अश्रुपुरित, बाजि उठलथि धीरे सँ, आब चलू केओ यत रह रहौ
पलटि हम देखलहुँ हुनका, चमकि उठल बच्चा जकाँ आँखि.. ओहो!
मेघाच्छादित भादब मास, घुप्प अन्हार, जेना भेल अचानक प्रकाश चहुँओर
हजारो चिड़ैकेँ एकसाथ चिड़बिड़ चिड़बिड़, जेना भरहल हो नव जीवन भोर
बहुत भेल, पिब नै ई चमकैत हलाहल, आब पिब अमृत प्याला
मन मलङ्ग अछि, चललहुँ हम सभ, बजा रहल प्रेमक मधुशाला

जन्म लेलौं हम जतए सीता माएक अछि गाम- प्रभात राय भट्ट


प्रभात राय भट्ट, पिता श्री गंगेश्वर राय, माता श्रीमती गायत्री देवी, गाम-धिरापुर, महोतरी, अस्थाइ बसोबास-जनकपुरधाम, नेपाल।
जन्म लेलौं हम जत सीता माएक अछि गाम
जन्म लेलौं हम जत सीता माएक अछि गाम
माए गै हमरा एतेक बता दे की अछि हमर नाम
कि कहै हमरा सीसी बोतल आर बिहारी धोती
आफद भगेल खाएमे हमरा अपने देशमे दू छाक रोटी
अपने देश बुझाइए परदेश शासक बुझै हमरा विदेशी
नै छौ तोहर कोनो नागरिक अधिकार तू भेले मधेसी
भूख स मोन छटपट करै भेटए नै किछु आहार
दया धर्म इमान नै छै शासकके कि करै तिरस्कार
की हमर राष्ट्र नै अछि? या हम सुकुम्बासी छी?
बौआ हमर नुनु यौ कान खोइल क दुनू सुनू यौ
अहाँ छी मधेशक धरतीपुत्र हम अहाँक मधेस माए
निठुर शासक के हाथ बन्धकी परलछि देलौं सभ किछु गमाए
तन मन धन स लुटक आब करै खून पसीना शोषण
आशा केर दीपअहि अछि हमर वीरपुत्र करू मधेस रोशन
मधेसमे जन्म लेली जे कियो, फर्ज तेकरा निभाबऽ ड़
नेपालस मधेस माएके मुक्त कराबड़
सुन्दर शांत स्वतंत्र एक मधेस एक परदेश बनाबड़
मंगला   भेटल नै आब छीन  लेब ड़
लड़ ड़ आजादीक लड़ा देब ड़ बलिदान
तखने भेटत मान समान  बनत मधेस महान 

गुलसारिका -संतोख अछि



बाहि केर डारि सँ खसला पर
जँ देह मे खोंच लागियो जाए त
संतोख अछि
सम्हारबाक चेष्टा त कएलहुँ अहाँ
भरिसक हमरे जकाँ अहिना
कोनो युग मे
धरा उधियाएल होएतीह
आ अम्बर हुनक डेन धरबाक चेष्टा मे
हुनकहिं उपर ओंघरा गेल होएताह
क्षितिज देखि त अहिना लगै
क्षितिज भ्रम नै
अनुपम सत्य थिक
किएक त क्षितजक पार
कोनो सत नै कोनो असत नै
सृष्टि नै ब्रम्हांड नै अतः
विध्वंसो नै
ते हमर हे सनातन अधिष्ठाता
तर्क छोड़ू
तर्कक गाछ पर सिद्धांक फड़ पकै छै
सेहो आस्था विश्वास आ प्रेमक पात
झड़ि गेलाक बाद
ते आब जखन हम प्रश्नशून्य छी
आँखिक आगू
उत्तरोत्तर उत्तरक बाढ़ि अछि
भसिया ने जा ते
आँखि मुनने स्वयं मे लीन
संकल्प दोहरबैत छी ठाढ़
जे आब एकहु डेग आगाँ नै
एकहु डेग पाछाँ नै अहीं त छी हमर पूर्णविराम
 

मिहिर झा -रुबाइ



किछु मीत भेटल किछु प्रीत भेटल
चहकैत नभमे किछु गीत भेटल
जन्म लेब नै छल हाथ मे अपन
जगकर्म करैत किछु रीत भेटल
बहुत पी लेलौं आब अओर जिद नै करू
बहुत जी लेलौं आब अओर जिद नै करू
टूटि रहल करेज हमर किश्त किश्त मे
बहुत सी लेलौं आब अओर जिद नै करू
छेद भेल करेज मे शराब कोना राखी
बहकल दिमाग मे हिसाब कोना राखी
जड़िल सिनेह छल सात जनमक
बितल उलहनक जवाब कोना राखी
भीजल केशस खसल बुन्न शराबक गिलासमे
शराबो निशामे माति गेल मिलनक अभिलामे
रहितौं जँ महादेव पचा लैतौं यौवनमद
देखि आब तृप्त भेलौं अनंत नित्य उल्लासमे
ऊँच नीचक भेद मिटबै छै शराब
दुश्मनो के दोस्त बनबै छै शराब
ड़ै कतबो बैसि टेबुल पर मुदा
डोलैत संग संग निकलै छै शराब
शराब त पानि छै निशा एकर अही छी
सिनेह त ठाम छै दिशा एकर अही छी
छैक शराबी संग टूटल करेजक गाथा
शराब पीबै कोइ खिस्सा एकर अही छी
अहा छोड़ि गेलौं हमरा देखू दारू बजा रहल अछि
लाल रंग मे रंगि देखू हमरा सजा रहल अछि
अस्पताल एक्केटा करेजक चोटक दुनियामे मिहिर
सिनेह देखि शराबक देखू दुनिया लजा रहल अछि
शराब देखि किछु मोन पड़ैए
बबूरक काट करेज गड़ैए
छोड़ि ने जा ई शराबो हमरा
तुरंत एकरा पीबड़ैए
लोक कहै जीबै ले पीयै छी शराब
मोन कहै पीबै ले पीयै छी शराब
सुनै बुझैक ज्ञान बचल नै आब
करेज के सीबै ले पीयै छी शराब
१०
हमर मोन झुमिते रहल हुनक गीतपर
दुनिया डाह करिते रहल एहेन मीतपर
अगिला जन्म ल उधार लुटाएल हुनका पर
समस्त हारि गबिते रहल हुनक जीतपर
११
मचोड़ल करेज देखि चान हँसि देलक
खूनक नोर देखि शमशान हँसि देलक
प्रीत केलौं एकदिसाहे हम प्रीतम सँ
पुछलौं जे दोष भगवान हँसि देलक
१२
सौ पटकनिया लगा देत हम्मर आँखिक काजर
सौंसे नगरिया घुमा देत हम्मर आँखिक काजर
पाछू पाछू डोलि हमर जनू करू सम बर्बाद
बीच बजरिया लुटा देत हम्मर आँखिक काजर

बन्द
चंचल यौवन लैत उफान छैक
कुंदन वसन भरै गुमान छैक
अंजन रंजित नयन वाण
हरि लेलक ई सभक प्राण
शस्त्र एहेन केलौं निर्माण
त्राहिमाम हे देव करू त्राण
चाह नै ई त विधि विधान छैक

बतहिया- सुबोध झा


सुबोध झा (१९६६- ), पिता श्री त्रिलोकनाथ झा
बतहिया
साँझ भेलै भोर हेबे करतै।
आँखि छै नोर हेबे करतै।।
पिया विरह मे छै मोन दग्ध।
की करतै मनःरोग हे
बे करतै।।
आब अ
नो सभ त कहै छिऐ ओकरा विक्षिप्त।
ओकर मोन
नै भऽ सकलै कहियो प्रेम सँ तृप्त।।
आँखि जोहैत छै बाट सदिखन।
मोन पड़ै छै बीतल दिन भरि क्षण।।
हमरा
नै अछि आशा घूरिकेँ औतै ओ।
फेर सँ ओकर प्रेमक दीप जरौतै ओ।।
मुदा ककरा बूझल छै ओहो घूमि रहल अछि भेल विक्षिप्त।
के मिलौतै दुनूकेँ सभ अछि अपनहिं आप मे लिप्त।।
ककरा छै एकरा दुनूक लेल खाली सम

सभ लागल अछि खाली करबामे धन संचय।।
जीअब त
देखबै कतेको सामाजिक अन्याय।
माय बाप भा
बहिन केओ नै हेतै सहाय।।
हे समाजक कर्ता धर्ता छो
ड़ू ई ताण्डव नृत्य ओ कुकर्म।
जीबऽ दियौ सभकेँ अपना ढंगसँ आ करू सुकर्म।।
सभ कहैत अछि भऽ गेलै आब प्रजातन्त्र।
हमरा जनें ई थीक पाइ
लाक षडयन्त्र।।
पाइ
लाक षडयन्त्र पाइ लाक षडयन्त्र।।।।
 

सभटा कि‍सानमे हमहीं बकलेल...- मो. गुल हसन


मो. गुल हसन, गाम-बेरमा, पत्रालय-बेरमा, भाया-तमुरि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार) पि‍न- ८४७४१०

सभटा कि‍सानमे हमहीं बकलेल...
अंगना सन जोति‍-जोति‍
 
खेत हम बनेलौं
 
डी.ए.पी. पोटास संग गहुम बुनलौं
सभटा कि‍सानमे हमहीं बकलेल
 
दौगू-दौगू यौ काका जुलुम भऽ गेल।

एहेन सुन्दर गहुम काका पाड़ा चरि‍ गेल
 
दौगू-दौगू यौ काका जुलुम भऽ गेल।

कच्ची आध कोस धरि‍ पाइपो पसारलौं
 
महग पानि‍ कीनि‍ गहुम पटेलौं
 
नै जानि‍ दैवा ई वि‍पत्ति‍ कि‍अए देल
 
दौगू-दौगू यौ काका डाका पड़ि‍ गेल।
 

अहीं सरपंच काका आँखि‍ खोलि‍ देखि‍यौ
घसबहि‍नी-चरबाहाक उपद्रवकेँ देखि‍यौ
 
खर्चा जोड़ैत-जोड़ैत
 
हमर खून सूखि‍ गेल
 
दौगू-दौगू यौ काका गहुम बकरी चरि‍ गेल।
 

लि‍खैत ई बात गुल हसन कहैए
 
कि‍ कहू काका आब कि‍छु ने फुड़ैए।
 
केलहा-धेलहा सभटा पानि‍मे चलि‍ गेल
 
दौगू-दौगू यौ काका डाका पड़ि‍ गेल।


बेटी- प्रीति‍ प्रि‍या झा


प्रीति‍ प्रि‍या झा, पि‍ता- श्री वि‍जय चन्‍द्र झा, माता- श्रीमति सीमू झा, न्म ति‍थि‍- ०१.०३.१९९४, सम्‍प्रति‍- छात्रा कथा १२, केन्‍द्रीय वि‍द्यालय टाटा नगर, आवासीय पता- गोलपहाड़ी मेन रोड, गायत्री मंदि‍रक नि‍कट, जमशेदपुर, पैतृक गाम- धनखोरि‍, फुलपरास, मधुबनी मातृक-  घोघरडीहा, मधुबनी
बेटी
जन्‍मकाल, आमक मज्‍जर
खुशीक पेटार
घरक लक्ष्‍मी बेटी
मुदा मंचेटा पर
सभ कहै छइ बेटी-बेटा एक समान
तँ कि‍अए दुख मनबैत छी
कन्‍याक जन्‍मपर
कि‍अए नै जन्‍माल जाइ छइ बेटी
एकटा पुत्रक आशामे
सात-सात बेटी
ककरो तनपर साफ वस्‍त्र नै
मुदा एकटा बेटा-
वएह- बौआ, बाबू, सुग्‍गा-नूनू
दोष ककरा देल जाए?
सबहक मति‍मे पुत्रमोह, ति‍लकक लोभ
ककरो मति‍ तँ बदलल नै जा सकैछ
बाप बेपारी आ बेटा वस्‍तु बनि‍
बजारमे पसरल अछि‍
बि‍कबाक लेल तैयार
चाम-मोट मुदा दाम चमनगर
जखन बेटीक बाप- तखन कनैत छी
मुदा! जखन बालकक पि‍ता
तँ भगवानक समान आदर चाही
बेटी सभ मारल जाइ छै
नीके हएत, बेटी खतम भऽ जाएत
रहि‍ जेता सभटा बालक कुमारे
प्रकृति‍केँ चुनौती दि‍अ?
वाह आर्यावर्तक पूत!! 
    

प्रेम- पवन कुमार साह,


पवन कुमार साह, जन्‍म– ०२.०२.१९८७, पि‍ता- श्री वासुदेव साह, गाम- खाप, पोस्‍ट- अन्‍धारवन (वासुदेवपुर), थाना- लाैकहा, जि‍ला- मधुबनी, (बि‍हार)शि‍क्षा- एम.ए. (अंग्रजी), एल.एम.एन.यू, दरभंगा
प्रेम
की पाप छल प्रेम हमर
की गुनाह छल प्रेम हमर
लगि‍ गेल कि‍ए एकरा एहेन नजरि‍
की पाप छल प्रेम.....
 जौं प्रेम पाप छी तँ
ई पाप हम करबे करब
कि‍यो मि‍लए ने दि‍अए चाहैए हमरा
मुदा हम ओकरासँ मि‍लबे करब
सभ कि‍छु ओकरा लेल मेटा गेल हमर
की पाप छल प्रेम......
सुनि‍ लि‍अ यौ प्रेमक दुश्‍मन
मि‍लैसँ हमरा नै रोकू
कऽ देलौं ओकरे न जीवन
हमरा आब कि‍यो ने टोकू
व्‍यर्थ भेल जि‍नाइ जि‍नगी हमर
की पाप छल प्रेम..... 

स्वाती शाकम्भरी -पिताजी



पिताजी वर्तमान दुनियाँ चाँद पर
मुदा अहाँ मचान पर बैसल
हमर भविष्यक चिंता कि करै छी
हमर भविष्य हमरे पर छोड़ि दि
आबो अपन अनरगल सोच सँ मनकेँ मोड़ि लि
नारी आब अनाड़ी नै
दुत्कारल कोनो भिखाड़ी नै
हम दबल कुचल कौनो अबला सन
रक्षक केर बाट निहाड़ी नै
हम स्वयं लड़ब ओइ दानव सँ
ममता विहीन ओइ मानव सँ
जे नारीत्व धर्म केर शोषक छै
कोमल भावक भक्षक छै
हम विवश वीरक वनिता नै
हम दुःखीता द्रौपदी सीता नै
हम रणचंडी दुर्गा काली छी
दानवीय भाव संहारी आ मानवीय सकल प्रतिपाली ।

स्तुति नारायण -मन पड़ैत अछि...



मन पड़ैत अछि पोखरि-झाखरि,
अपना गामक बान्ह
अपना गामक खेत-पथार
टेढ़-मेढ़ ओ बाट
मन पड़ैत अछि महमह गमकैत,
मोजरल आमक गाछ
भोर अन्हारे महु बिछि आनब,
लोढ़ब फुल-बेलपात
मन पड़ैत अछि लुधकल जामुन,
लीची, बैर, अनार
आमक कुच्चा, सागक मोचरा,
इमली आर अचार
रनै-बनै कत फिरै छँ,
माक झिड़की डा
चल सभ बच्चा कलम चलै छी
पिताक सहज दुलार
टोला परके धिया पुता आर
कलमक ऊँच मचान
गप-सप आ हसी-सी मे
सीखब जीवन पाठ...

अन्तिम क्षणमे- रवि मिश्र “भारद्वाज”,


रवि मिश्रभारद्वाज, पिता श्री पशुपति मिश्र, गाम- ननौर, जिला- मधुबनी।
     अन्तिम क्षणमे
काल्हि किछु काल असगरेमे
हम केलौं अपनासँ किछु बात
पुछलौं अपनासँ बिना मतलबक
की ककरो तोहर छौ आस
कियो नै भेटल जे चाहितै, सुनितै
हमरासँ हमरा भाव-विभोर कऽ,
चाहलक तँ सभ कियो हमरा,
मुदा नै देखलक हमर आँखिक नोरकेँ
बेचैन भऽ कऽ कानए लागल
हमरेपर जखन हमर आँखि
हँसि कऽ लोक हमरा देखऽ लागल
ऐ उमरोमे एना
कि कियो देखावा कऽ सकै छै
हँसऽ लगलौं हमहूँ हुनका देखि कऽ
दुख अपन हँसीमे नुका कऽ