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Tuesday, September 4, 2012

सुनील कुमार झा- हाइकू



झूमि झूमि कऽ/ चलल गजराज/ जंगल बीच
जंगल बीच/ गम्हराएल अछि/ आमक बौर
अहाँ खेबए/ भरत मोर पेट/ यैह सन्देश
लहरैत यऽ/ ई हरियर खेत/ गामक बीच
अति सुन्दर/ आ नयनाभिराम/ नौका विहार
शांत समुन्द्र/ तखनो यऽ तकैत/ बटोही बाट
संगम अछि/ ई आकाश पानिक/ जंगल बीच
ललका माटि/ आ करिया पहाड़/ घरक पार
घात लगौने/ चौकन्ना बैसल यऽ/ कारी बिलाड़
चीर देलक/ पहाड़क करेज/ ई अछिंजल
अनुपम ई/ हरियर आ लाल/ प्रकृति लीला
प्रकृति प्रेम/ खोजि रहल छैक/ बियाबानमे
गरजैत ई/ क्षीरक कछारमे/ हहराबैत
शांत समुन्द्र/ कपाड़ उठौने यऽ/ दुनू पर्वत
मनुख लेल/ प्राकृतिक रचना/ स्वर्ग समान
देखलौं नञि/ एहन भयानक/ पानिक रूप
अथाह नै यऽ/ किछु ऐ दुनियामे/ ई जानि लिअ
पंख फुलौने/ गुटुर गुटुर गूँ/ बैसल शांत
हरियर नै/ पहिल बेर देखलौं/ करिया तोता
कट्टमकट/ करैत गजराज/ जंगल बीच
बियावान मे/ गजराजक क्रीडा/ अभूतपूर्व
अथाह खोह/ पतनाला बनल/ हिमक तीर
नील गगन/ आ नील सागरक/ अद्भुत मेल
बहि रहल/ पहाड़क कोखसँ/ वसुधा नीर
प्रकृति केर/ अद्भुत रचना ई/ वृक्ष मनुख
बैसल सुग्गा/ खोझाँए रहल यऽ/ अपनेपर
अथाह जल/ ई पानि आ पाथर/ प्रकृति माया
अन्हार भेल/ चन्द्रमाक प्रतापे/ सौँसे धरती
मस्त पड़ल/ प्रकृतिक गोदमे/ आदमखोर
लागल दाग/ हमर पृथ्वी पर/ सूर्य प्रताप
नुकाएल यऽ/ कुनू धूर्त चतुर/ जीव आ जंतु
अद्भुत दृश्य/ नयनाभिराम ई/ अथाह क्षीर
कतेक नीक/ नभ कए चुमैत/ ई हरियाली
अनंत दिस/ देखाए रहल यऽ/ पृथ्वीक बच्चा
जलक रानी/ मारैत हिलकोर/ छप्प-छप्प कऽ
धरातलमे/ जीवन वसुधा यऽ/ शांत पड़ल
सर्पिल पथ/ देखलौं नै कतउ/ एतेक नीक
सड़क लेल/ चीर देलक अछि/ समुन्द्रक करेज
चललौं बड़/ कनी टा रुकि जाउ/ फेर चलब
बियावानमे/ पतनाला जकाँ यऽ/ कारी गंडक
उडै़त धूल/ ललका पहाड़सँ/ कनी सोचियौ
अद्भुत दृश्य/ कहलो नै जाइ यऽ/ एकर छटा
हरित बन/ हरियरका गाछ/ हर्षित मोन
आगिक गोला/ चमकि कऽ खसल/ अनंत बीच
ई डगहर यऽ/ चमकैत यऽ जेना/ आगिक लुत्ती
कोना जीवन/ काटब एहिठाम/ एते ठंढमे
पसरल यऽ/ दूर दूर धरि ई/ उज्जर हिम
उज्जर हिम/ नख सँ शिख तक/ छारल अछि
नटुआ सभ/ करि रहल छैक/ मिलकऽ हल्ला
देखियौ कला/ देहरी चौबटिया/ कलाकारक
जगाऽ रहल/ गाम गाम घूमि कऽ/ लोक सभकेँ
नाचि रहल/ ढोल कऽ धुन पर/ छोड़ा आ छौड़ी
करैत हल्ला/ नुक्कड़ नाटक सँ/ गली मोहल्ला
रिलीफ लेल/ टूटी पड़ल छैक/ कछार पर
कोशीक डोड़ि/ भागि रहल छैक/ उचास पर
तम्बू गाड़ने/ जीवनक निर्वाह/ करि रहल
साँझक बेर/ सूर्य देवक आगाँ/ जोड़ैत हाथ
लहराएब/ झंडा राम राज्यक/ देश विदेश
विदेश सेहो/ करैत प्रचार यऽ/ रामायणक
दुहि रहल/ पेट भरए लेल/ ऐ बकरी केँ
करियौ कृपा/ करैत छी नमन/ हे छठी माइ
सड़के कात/ बेचि रहल छैक/ हाथक कला
दूर नै यऽ/ बस चारि कदम/ मंजिल लेल
 भेटल मान/ चहकि रहल यऽ/ दुशाला ओढ़ि
कोना कऽ बची/ हलाहल पानिसँ/ सोचि रहल
 हरियरका/ हरके गाछ पर/ लटकल यऽ
पातर गाछ/ लटकि रहल यऽ/ कतेक नीक
मोहक दृश्य/ पहाड़केँ छापने/ नीलका मेघ
खोजि रहल/ जमीनक हिसाब/ कते कटल
मचान पर/ जमघट लगौने/ बहैत नोर
नील मेघसँ/ उतरि कऽ बैसल/ नील गौरैया
कोनाक खाउ/ सोचि रहल छैक/ नील गौरैया
अम्बर तर/ हरियर वनमे/ बसल गाँव
कलाकार केँ/ देखइ लेल नाटक/ जुटल भीड़
स्वर्गक सीढ़ी/ बनाए देलक यऽ/ विधना लेल
सुस्ताबै लेल/ रेतक समुन्द्र मे/ बैस गेलाह
 थाकि गेला जे/ रेत मे दौड़ी कए/ बैस गेल यऽ
 अपन कला केँ/ प्राकृतिक रंग सँ/ भरि देलक
जंगल बीच/ बयारक डर सँ/ उड़ै पक्षी
साँझक बेर/ हकरैत आकाश/ जंगल बीच
फेनिल पानि/ कल कल करैत/ देत डुबाए
धरती पर/ उतरि रहल यऽ/ नभ प्रकृति
जीवन केर/ जीबैक इच्छा/ मरितो काल
हिमक वर्षा/ चारू कात/ सौँसे अन्हार
निर्मल पानि/ शांत पड़ल छैक/ यऽ किछु बात
ठूँठ गाछमे/ अकुलाइत चिड़ै/ प्यासल चोंच
प्रकृति केर/ उकेर देलक यऽ/कलाक प्रेमी
बंजर भूमि/ महकि रहल यऽ/ लाल फूलसँ
फुलवारीसँ/ गगनमे खुशबू/ फैल रहल यऽ
मोहक दृश्य/ प्राकृतिक रचना/ इन्द्रधनुषी

सुनील कुमार झा- टनका



सुनील कुमार झा, सोनवर्षा राज, सम्प्रति- दिल्ली।
टनका
स्वर्ण समान/ चमकि रहल-ए/ ई हिमखंड/ लागैत जेना यऽ/ लहकैत अंगोरा
नाचैत मोन/ जंगल देखि-देखि/ स्वर्ग समान/ मोन करए अछि/ बनि जाउ मोरनी
ऊँच पहाड़/ एहन लागए यऽ/ सीना तानने/ दुश्मन केर आगू/ सिपाही ठाढ़ छैक
एतेक नीक/ नै देखलौं कतउ/ नील पहाड़/ एहन लागए यऽ/ उतरि गेल स्वर्ग
पेटक लेल/ घूमि घूमि गाम मे/ की की करता/ अपना कानियो कऽ/ दोसरकेँ हँसैत
रुइया जकाँ/ नभ शिखर तक/ छारल हिम/ लागैत धरा पर/ स्वर्ग उतरि गेल
कारी पहाड़/ पानियो कारी छैक/ बियावानमे/ लागए छैक जेना/ भूतक रहै डेरा
तपि रहल/ मरुभूमिक बालू/ एतेक जोर/ कनी देर ठमकू/ फेर बढ़ब आगू
घुरि रहल/ घुमौआ बनि कए/ सर्पिल पथ/ लागए महादेवक/ अछि कंठक हार
जीवन नीर/ पहाड़ सँ घिरल/ पुछैत प्रश्न/ शांत कोना रहब/ हम गतिशील छी
जलक रानी/ सोचि रहल अछि/ मोने मोनमे/ जतेक उछलब/ ततेक तर जैब
खसैत नीर/ पहाड़क कोखसँ/ पृथ्वीक गोद/ एहन यऽ लागैत/ छलनी कए देत
अनंत लोक/ चक्क सँ चमकल/ जननी अछि/ जतए जनमल/ हम अओर अहाँ
बताबैत यऽ/ ई दुनु टा पर्वत/ की अथाह नै/ किछु दुनिया मे यऽ/ ई जानि लिअ सभ
ई हरियाली/ पुछैत यऽ सभसँ/ मोन मलीन/ कोन गलती भेल/ किए काटए अछि
क्षीर समुन्द्र/ देखि कए एकरा/ पुलकित यऽ/ मयूर जकाँ नाचै/ हमर अहि मोन
खोजैत बाट/ ई महींसक झुण्ड/ जंगल बीच/ किछु अकुलाएत/ किछु क्रीडा करैत
ई म्याउ म्याउ/ आँखि चमकाए कऽ/ ताकैत बाट/ की कोन बाटे एता/ मुसक महराज
ऊँच आ नीच/ उबड़ आ खाबड़/ आकाश तोर/ खड़ा छैक तानि कऽ/ अपन करेज ओ
अथाह बन/ जइ बीच झरैत/ शीतल जल/ सभ कियो मिटाउ/ अपन क्षुधा कए
बंजर भूमि/ तखनो खोजैत यऽ/ भेड़क झुण्ड/ की किछु भेटि जाए/ क्षुधा शांतिक लेल
जेकर नोर/ नेता केँ मात दैए/ वैह थीक ई/ कनी सोचियौ ई की/ ई मगरमच्छ छी
आएल बाढ़ि/ डूबि गेलनि खेत/ देखियौ हाल/ गामक बथानक/ एहने हर साल
भुखाएल छी/ तखने यऽ भरैत/ बच्चाक पेट/ ई प्रेम यऽ मायक/ की भविष्यक स्वार्थ
धुंध एहन/ तखनो मुस्काबैत/ पहाड़ी फूल/ खेलैत ओस संग/ मस्तीसँ झूमि कए
चलू कऽ लिअ/ नावक सवारी यौ/ शहर बीच/ चांदनी राति बीच/ चमकौवा नावमे
दैत सनेश/ ई जे आमक गाछ/ रहू झुकल/ जौं बेसी यऽ अहाँक/ नै तँ टूटि जाएब

जगदानन्द झा “मनु” -हजल


जगदानन्द झा “मनु”
हजल
गदहराज धन्य छी दिअ  सदबुद्धि हमरो अहाँ
उपर लदने बोझ नै आँखि देखाबी ककरो अहाँ

धियान मग्न रहि मधुर तान ढेंचू-ढेंचू करै छी
मन्त्र  जनैत छी शास्त्रीय गायन कए सगरो अहाँ

मनुख पबैत सम्मान विशेष नाम अहीँक लऽ कऽ
बिन आपति बर्दास्त करी नहि करी झगरो अहाँ

स्वर्ग गेलौं लागले छान ई कथा जगजाहिर अछि
करु पैरबी कनी हमर बियाहक  जोगरो अहाँ

गृहस्थक जुआ कान पर 'मनु' खटब आब कोना
दिअ गदहपन जँ बुझलौं अपन हमरो अहाँ
(सरल वार्णिक बहर, वर्ण-१९)

कुन्दन कुमार कर्ण- आजाद गजल

कुन्दन कुमार कर्ण, नेपाल। आजाद गजल जइ प्रेममे दर्द नै तइ प्रेममे मजा की प्रेमसँ बढ़ि कऽ मजा नै मुदा धोखासँ बढ़ि कऽ सजा की जबरदस्तीक मुसकीसँ ओ मोन पतिऔलक जइ मुसकीमे चुसकी नै तइ मुसकीक मजा की खोटसँ भरल प्रेमकेँ जिनगी भरि पुजलौं जइ प्रेममे श्रद्धा नै तइ प्रेमक पूजा की दिलमे जेहो रानी छल सेहो केलक बैमानी जइ दिलमे रानी नै तइ दिलक राजा की तालमे रहल जिनगी जेना बेताल भऽ गेल जइमे सुरताल नै हुअए तेहन धुनक बाजा की

गजल- अमित मिश्र

अमित मिश्र, गाम- करियन, समस्तीपुर। नव अंशु (गजल-हजल, रुबाइ संकलन) प्रकाशित।

गजल
आखर जखन रूपक लिखल
उपमा सजल फूलक लिखल

आदर्श छी रूपक बनल
काजर नयन कातक लिखल

सरगम अहाँक स्वर सजल
मुस्की नगर तानक लिखल

कहलौँ करेजक सभ कहल
किछु बात हम राजक लिखल

चमकैत नभ मे छी चान
तारा गजल हाटक लिखल

(मुस्तफइलुन-मफऊलातु 2212-2221 बहरे- मुन्सरह)

गजल - चन्दन कुमार झा

चन्दन कुमार झा, मोनक बात (गजल, हजल,बाल गजल, रुबाइ आ कताक संकलन) प्रकाशित।

गजल
मोनक बात मोनहि मे रखैत छी
चुप्पी लाधि हम जिनगी कटैत छी

चकमक जगत, लागल चौन्ह लोककेँ
घर अन्हार चैनक निन सुतैत छी

झूठक लेल आमिल लोक छै पिने
हम सत्तो जनेबा ले कुथैत छै पिने

बेचल खेत-डाबर-डीह गुजर ले
तैयो केस कित्ता दस लड़ैत छी

जुन्ना जड़ल ऐंठन एखनो बचल
"चंदन" बोल तै ऐंठल बजैत छी
२२२१ २२२१ २१२

गजल- रूबी झा



रूबी झा, बेगूसराय, सम्प्रति गुजरात।
गजल
आबए अछि मजा रसिक पर कलम चलाबए सँ
बनि गेल जे गजल हुनक चौअन्नी बिहुँसाबए सँ

प्रेम होए मे नहि लगैत छैक बरख दस बरख
भऽ जाइ छैक प्रेम बस कनेक नजैर झुकाबए सँ

जँ प्रेम मे कपट होए टूटितो नहि लागै छैक देर
जेना टूटि जाइ छैक काँच कनीके हाथ लगाबए सँ

जँ नहि बुझि पेलौं आँखिक कोनो इशारा कहियो अहाँ
आइए की बुझब आँखि सँ हमर नोर बहाबए सँ

ताग टूटल जोरबा सँ पड़ि जाइ छैक गीरह जेना
रूबी ओझरैब ओहिना बेर बेर प्रेम लगाबए सँ

(आखर -२०)

गजल- सद्रे आलम गौहर



सद्रे आलम गौहर, गाम-पुरसौलिया, भाया- जयनगर, जिला मधुबनी। मैथिली गजल लेल गजल-कमला-कोसी-बागमती-महानन्दा सम्मान २०११ प्राप्त।


जे घुसखोरी भागत
बहुत नीक लागत

लगेने रहू एहिना
अन्ना जी तागत

जे सभ आगू अउता
करै छिअनि स्वागत

ईमनदार नेता
के बूझू नियामत

सफलता जँ पायब
तँ विश्वास जागत

समर्थन दियौ ऐमे
नहि कानो लागत

भष्टाचार कऽ देत
भारत केँ गारत

देशवासी बढ़बियौन
अन्नाजीक तागत

किछु क्षणिका- अनुप्रिया योग


अनुप्रिया योग, सुपौल, सम्प्रति- दिल्ली।
किछु क्षणिका

आकाश गंगाक
गर्भमे किलकैत
नवजात पृथ्वी

भरल अछि
सौन्दर्य आ जीवनसँ
प्रकृतिक छवि

सूर्यक रथ
बढ़ि रहल यऽ
हिम शृंखलासँ

 प्रकृति केर
अद्भुत अनुभव रूप
मन मुग्ध-मुग्ध

टूटल यऽ कोनो तारा
या प्रकाश स्तम्भ
प्रकृति केर सभ लीला

ई मेघ नै
मनक उड़ान छी
नीलाम्बरमे

जीवनक
अद्भुत संघर्ष
अकथ कथा

धर्म संस्कृति
अभिनव महान
भरत जयगान

मध्यम वर्गक
घर कही या, नीन्दमे
हँसैत बालक
१०
संस्कृति
केर रक्षामे
उतरल नव पीढ़ी
११
अपन संस्कृति
केर स्वागतमे
नव पीढ़ी
१२
अमृत धार
जीवन अद्भुत
हँसैत जीवन
१३
छठि पर्वमे
सूर्य आराध्य
अद्भुत अछि श्रद्धाक भाव
१४
मुग्ध करैत
प्रकृतिक रूप
जीवन युक्त
१५
ई मिलन अछि
भिन्न संस्कृति
भिन्न पहिरावा केर
१६
हरियर कचोर
जीवनक पल्लवित
रंग रूप
१७
उगि आएल
मेघक गाछ
श्यामापर
१८
डूबि रहल
उम्मीद
पानिमे
१९
डूबि रहल उम्मीद केर नाव
पानिमे
२०
पहाड़क कोरा
मेघक छाह
हँसैत गाम
२१
कोमल पाँखि
अथाह
नीलाभ
२२
थाकल तन
भीतर प्यास
मनमे मुदा भरल आश
२३
जमघट मेला
रोजी-रोटी
खूब जिन्दगी
२४
स्वप्नसँ भरल
मनक उड़ान
अथाह गगनमे
२५
एक दोसराक अंकमे
लजा रहल यऽ श्याम
आ हँसि रहल यऽ गगन
२६
ठोप-ठोपमे
जीवन
बसैत अछि
२७
नंग धरंग जीवन केर छवि कहू
या जीवन केर आसमे
नेनपन केर प्रश्न
२८
सूर्यक आभामे
मंजिल देखा गेल
जीवन केर नव रूप
२९
सूर्यक आभामे
मुखरित
जीवन

नवका बाट- अनामिका राज



अनामिका राज
जन्म तिथि ०७.०५.१९८६, शिक्षा एम.एस.सी. वनस्पति विज्ञान, गाम- विषनपुर (खगड़िया), पिता- दामोदर राम (प्रोफेसर भौतिकी विभाग), पति- अशोक राज (परीवीक्षण अधिकारी, पंजाब नेशनल्ल बैंक, खगड़िया)। विशेष: मैथिली नाटकमे अभिनय।

नवका बाट
आशा आ विश्वासक
बीचमे फाँसल,
गर्त होइत जिनगी भोगनिहार
दुइये लोक होइछ
बोनिहार आकि नारी!
दुनू सामन्त कि पूँजीवादी द्वारा
भोगबाक चीज
बनि रहि जाइछ

भोगनिहार एकर
मर्दन करैत
अपन पुरुषारथ देखेबाक
माउग प्रयास करैए।
आब उलटबासी
काज करए लागल अछि।
फूटए लगलैए बोल
बोनिहारक

कमा कऽ घर चलबै
जोगरक भऽ गेल अछि नारी
अगिला बाट
एकरे हाथमे आबि कऽ
अटकि गेल अछि।

Tuesday, August 28, 2012

कि‍छु ने बूझै छी :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


कि‍छु ने बूझै छी

के केकर हि‍त के केकर मुद्दै
दि‍न-राति‍ देखैत रहै छी।
गरदनि‍ पकड़ि‍ जे कानए कलपए
पकड़ि‍ गरदनि‍ तोड़ैत देखै छी।
कि‍छु ने बुझै छी।
हि‍त बनि‍ मि‍लि‍ संग चलैए
मुद्दै बनि‍-बनि‍ लड़ैत रहैए।
सोझमति‍या चालि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍
झाँखुर-बोन ओझराइत रहैए।
डारि‍-पात देखैत रहै छी
कि‍छु ने बुझै छी।
छत्ता-मधु दुनू बसि‍-बसि‍
वि‍ष मधु गढ़ैत रहैए।
हि‍त मुद्दै बनि‍-बनि‍ दुनू
राति‍-दि‍न झगड़ैत रहैए।
देखि‍ झगुंंता पड़ल रहैए छी
कि‍छु ने बुझै छी।
संग मि‍लि‍ पाथर तोड़ए जे
पाथर ऊपर फेकैत रहैए।
पाथर मन गढ़ि‍-मढ़ि‍
पाथर बूझि‍ देखैत रहैए।
पथराएल पथ देखैत रहै छी
कि‍छु ने बुझै छी।
आगि‍ चढ़ि‍ अन्न जहि‍ना
पथरा पाथर बनैत रहैए।
जीवन दाता कुहुकि‍-कुहुकि‍
पेट पाथर बनैत रहैए।
वि‍षमि‍त भेल बि‍सबि‍साइत रहै छी
कि‍छु ने बुझै छी। 

दि‍न-राति‍क खेल :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल

दि‍न-राति‍क खेल

अपने हाथक खेल मीत यौ
अपने हाथ खेल।
संगे-संग दुनू चलैए।
इजोत-अन्‍हार बनैत रहैए।
हँसि‍-हँसि‍ कानि‍-कानि‍
पटका-पटकी करैत रहैए।
एके गाछक डारि‍ छी दुनू
सुफल-कुफल फड़ैत रहैए।
रस रंग सुआद गढ़ि‍-गढ़ि‍
तीत-मीठ बनबैत रहैए।
अपने हाथक खेल मीत यौ
संगे-संग खेलैत रहैए।
लपकि‍-लपकि‍ कतौ-कतौ
इजोत-अन्‍हार दबैत रहैए
पीट्ठी चढ़ि‍ पीठि‍या-पीठि‍या
एेरावत सजबैत रहैए।
तँए कि‍ अन्‍हार हारि‍ मानि‍
हरदा कहि‍यो कबूल करैए।
जहि‍ना झपटि‍ बि‍लाई बाझकेँ
जि‍नगीक खेल देखबैत रहैए।
अपने हाथक खेल मीत यौ
संग मि‍लि‍ संगे चलैए।
मंत्र एक रहि‍तो दुनूक
वि‍धा दू कहबैत चलैए।
वि‍धि‍-वि‍धान रचि‍-बसि‍ दुनू
गद्य-पद्य गढ़ैत रहैए।
चढ़ि‍ गाछ तनतना-तनतना
गीत-कवि‍त्त सुनबैत रहैए।
ताना दऽ दऽ वि‍हुँसि‍-वि‍हुँसि‍
मारि‍ तानि‍ हँसि‍-हँसि‍ कहैए।
एके गाछक खेल मीत यौ
संगे मि‍लि‍ दुनू खेलैए।
बजा पीहानी नाचि‍-नाचि‍

रंगमंच दुनि‍याँ सजबैए।

कंठ कोकि‍ल कवि‍त्त कवि‍

कवि‍काठी बजबैत रहैए।

कतौ ने कि‍छु छै दुनि‍याँमे

मन मानव गढ़ैत चलू।

मानव मनुख खरादि‍-खरादि‍

राति‍-दि‍न बनबैत चलू।

अपने हाथक खेल मीत यौ

हाथ-हथि‍यार बदलैत चलू।

उठी-बैसी :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


उठी-बैसी

हमर तेही मे नाम, हमर तेही मे नाम।
हमरा उठलेसँ काम, हमर बैसलेसँ काम
हमर तेहीमे नाम......।
उठी लेब कि‍ बैठी, बाजू-बाजू धड़-धड़ाम
उठी लऽ जँ बैसब, आ कि‍ बैठी लऽ जँ उठब
छुबि‍ते भरब पद पराम
हमर तेहीमे नाम, हमर तेहीमे काम।
खेल खेलाड़ी खेलि‍ खेल

बाल-बोध लि‍खबै छै नाम

खेल जि‍नगीक खेला-खेला

मृत-अमृत पाबि‍ सूरधाम।

हमर तेहीमे नाम हमर तेहीमे काम

हमरा उठले से काम, हमरा बैसले सँ काम।

मीत यौ, अपने पाछू :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


मीत यौ, अपने पाछू......

अपने पाछू बौआइत रहै छी
मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी।
दि‍न-राति‍ ढहनाइत रहै छी
राति‍-दि‍न गनहाइत रहै छी
अपने पाछू बौआइत रहै छी
मीत यौ......।
पछुआ बनि‍ पछुआर पहुँचि‍ते
पेट-पीठ, पाँजर देखै छी
हड्डी छाती छि‍टैक‍-सि‍सैक
पखुड़ा बनि‍ सूर-तान भरै छी

पखुड़ा बनि‍ सूर-तान भरै छी

मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी।

जुआ-जुआ, जुआ-जुआ

नांगड़ि‍ ऐँठि‍ चलैत रहै छी

लाद ऊपर लादि‍-लादि‍

टूटि‍-टूटि‍ गीरह बनैत रहै छी

मीत यौ, अपने पाछू बौआइत रहै छी

अपना के अप्‍पन बूझि‍-बूझि‍

अपने पाछू ओझराएल रहै छी

अपनापन भाव बि‍नु बुझि‍तो

अगुआर-पछुआर नाचि‍ रहल छी।

मीत यौ, अपने पाछू......।

यार यौ, गड़ि‍-मुड़ि‍या :: जगदीश प्रसाद मण्‍डल


यार यौ, गड़ि‍-मुड़ि‍या......

गँड़ि‍-मुड़ि‍या बोझ पड़ल छी
यार यौ, गँड़ि‍-मुड़ि‍या बोझ बन्‍हल छी।
पबि‍तो धार घास बनि‍-बनि‍
बन्‍हैक लूरि‍ गढ़ैत रहै छी
बाल-मन कि‍छु ने बुझै छी
पछुआ रूप सजैत चलै छी
यार यौ गड़ि‍-मुड़ि‍या बोझ बन्‍हल छी।
तहक-तह, तहि‍या-तहि‍या
पाँजक-पाँज पड़ल रहै छी
केकरो छीप केकरो नांगड़ि‍
गोर गोरथारी बनल रहै छी।
भयार यौ, गोरथारी बनल रहै छी।
गँड़ि‍-मुड़ि‍या बोझ पड़ल रहै छी।
गँड़ि‍-मुरहा घर बनि‍-बनि‍
गँड़ि‍-मुरहा चालि‍ चलैत रहै छी
गँड़ि‍-मुड़ि‍या गीत गाबि‍-गाबि‍

चालि‍ कोइली सीखैत रहै छी

पार्टनर, अहींकेँ कहै छी

गँड़ि‍-मुड़ि‍या बोझ बन्‍हैत रही छी।