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Wednesday, December 19, 2012

अर्चिस

अम्बरा

कियो बूझि नै सकल हमरा

तीन जेठ एगारहम माघ

रातिदिन

गीतांजलि

इन्द्रधनुषी अकास

विदेह मैथिली पद्य (तिरहुता वर्सन)

विदेह मैथिली पद्य 2009-10

विदेह मैथिली पद्य 2009-10 (तिरहुता)

Saturday, September 29, 2012

दृष्टि‍कोण :: शि‍व कुमार झा 'टि‍ल्लू'

दृष्‍टि‍कोण

हि‍आक दू गोट रूप
अवलोकन आ वाचन
पहि‍लुक मात्र अपनहि‍ लेल
दोसर समाजकेँ जनेबाक लेल
पहि‍लुक जौं सद्गमनीय
स्‍व-संतोष आ कल्‍याणकारी जीवन
ओहेन व्‍यक्‍ति‍मे
दोसरक कोनो आवश्‍यकता नै
हमर जीवन पोथीक फूजल पन्ना
सभ वाचन दइत
पोथीक आखरक संग-संग
जौं पटल अर्थात् पृष्‍ठ कारी
केना आखर देखाएत?
एहेन फूजल अर्न्‍तमनक
कोनो प्रयोजन नै
मनसा-वाचा कर्मना
तीनू त्रि‍वेणीक धार जकाँ
वि‍लग... छि‍ड़ि‍आएल...
ई बेवस्‍थाक फेर नै
आ ने जाति‍-वंशक प्रभाव
जौं रहि‍तए तँ बैरमखाँक आंगनमे
रहीम फुदकैत केना?
जखन गुरुजीक मुखसँ
पहि‍ल बेर सुनलौं
आश्चर्य लगल छल
डार्विन जौं ई सुनि‍तए
तँ वंश-सि‍द्धान्‍त नै लि‍खतए
कि‍एक अछि‍ दृष्‍टि‍कोणक फेरि‍?
ई मात्र अर्थयुगक वि‍जय
सभ आगू जेबाक लेल
बपहारि‍ काटि‍ रहल
नीक गुण-धर्मसँ
नीक बाटपर नै
कुकरम करब मुदा
सभसँ आगू नाचब
पथ्‍य स्‍वादहीन होइछ
बाबाकेँ ब्रह्मपहरमे
दुग्‍ध पानक अभ्‍यास छलनि‍
हमहूँ प्रयास कएलौं
दूध तँ ि‍नरंतर नै रहि‍ सकल
मुदा! सुरापान धरि‍
अवश्‍य करए लगलौं
अपने टा नै
समाजक जाति‍क भारसँ
दाबल भरि‍आक बीच
कुहरैत संस्‍कारी दि‍लीप
कोनो राज पुत्र नै
रैदासक वंशज दि‍लीप
खूब पढ़ैत छल
हम घुमैत छलौं
आब ओकरो सि‍खा देलि‍ऐ
दुनू पि‍बैत छी
वाह रे मनुक्‍खक मोन
ऐ सँ नीक चाली
नोन देखि‍ते बाट बदलि‍ लइत
हम मनुक्‍ख छी
आर्यावर्त्तक वैदि‍क
सनातन पालक
पुरुष सूक्‍तसँ देल उपाधि‍
ब्रह्मकुलक पूत
हमहीं भँसै छी
कोनो ने मानवताक भीत ससरए
नानक-रैदास ईसा बुद्ध
परशुराम बुद्ध कृष्‍ण राम
सुरगण कुहरि‍ रहल
रहीमक अस्‍ति‍त्‍व वाम
अंतमे कनै छी
देखि‍ अवोध चि‍लका बि‍लखइए
अपन संग दोसरोक कल्‍याण
नै सोचलौं
की भेटल
मनु-वंशकेँ नाश कऽ देलौं
तँए जे देखू वएह सोचू
वएह अर्न्‍तमन सएह वाचन
नीक केलक नीक भेटल
अधलाह परि‍णाम स्‍वत: भोगैए
ईश्वर छैक की नै
वि‍षय गौण बुझू
मुदा! प्रकृति‍ तँ अवश्‍य
जकर डांगमे कोनो ध्‍वनि‍ नै
अधलाह परि‍णाम भोगबे करत
अधरकेँ हि‍आसँ जोड़ि‍
हमर दृष्‍टकोण नीक
चि‍चि‍आउ नै
सोचू.....
अान्‍हर रहू मुदा
सबहक कल्‍याण करू
जौं एतेक शक्‍ति‍ नै
तँ अपने कल्‍याण करू
जहानमे दृष्‍टि‍कोण वि‍हान
अवश्‍य अाएत।

Tuesday, September 4, 2012

गीत- रामभरोस कापड़ि भ्रमर


रामभरोस कापड़ि भ्रमर, १९५१-। जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)। बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)। नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता- श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (२०१०)


गीत

ओ पवन, झिहिर झिहिर बहैत जाउ
छूबि बताउ कने, पिया छथि कतए केकरा संग
वर्षहु गेला भेलनि‍, सुधिबुधि किछु ने छन्‍हि‍!
दिन भेल पहाड, दुख भेल जीवनक अंग।

निष्‍ठूर समाज चाहे, नोचि नोचि खाइ जेना
शेरक भूख बनल जवानीक तरंग जेना
चारुभर शिकारी ताकमे बैसल अछि
रहल ने कोनो उमंग!
ओ प, पिया छथि कतए केकरा संग!!

अधिकारक बात सभ लागु ने भेल कखनो
नारीक बेथा-कथा कमैनीक धंधा एखनो
जान जोखिम बनल कतए धरि घींचब
त्‍यागब प्राण वियोगे कन्‍त!
ओ पवन, पिया छथि कतए केकरा संग!!

जानि जानि आगिसँ खेली केना हम
शक्ति भरल मुदा तौली केना हम
शील, सुशील मिथिला केर ललना
पतिक परोक्ष भेल शिथिल तरंग!
ओ पवन, पिया छथि कतए, केकरा संग!!


कामिनी कामायनी -वसन्त



नाचि रहल व तरंग
नूतन वसंत नूतन वसंत।
व ताल वृन्द व छाग फाग
व गेह देह व पात साग।
व बाट हाट व प्रीत गीत
व लाेभ क्षाेभ व हास्य रूदन
नवनीत रूप व कमल नयन।
मन हर्षित भऽ नितराति कहल
आएल वसंत वका वसंत।
व सखी सखा व मधुर रास
वका सूरूज वका प्रकाश।
व तालमेल व धूर खेल
व जान माल व वृद्ध बाल।
सभ तर मदमातल छै अनंग
व वसंत नूतन वसंत़।
व स्वप्‍न नयनमे उठल उठल
उल्लास हियमे भरल भरल।
रज कणसँ झाँकैत अछि पर्यन्त
वका वसंत वका वसंत।
व कुसुम कली सकुचाए उठल
मदमस्त भ्रमर मडराए रहल
कुहुक काेयलिया गाबि रहल
रस रंग सुधा बरसाय रहल।
अल्हड बसात चलै सनन सनन
मकि उठल नंदन कानन।
आएल गाएल मन माेहि चलल
नूतन वसंत व वसंत।

सहास- इन्द्रभूषण कुमार


इन्द्रभूषण कुमार, पि‍ताक नाओं- स्‍व. पुलकि‍त साहु, गाम- लक्ष्‍मि‍नि‍याँ, पोस्ट- छजना, भाया- नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)


सहास
भऽ रहल छल आयोजन काव्यपाठक
जुटल छल कविलोकनि सभ भागक
समाप्त भेल औपचारिकता
पढ़ए लागल कवि सभ अपन-अपन कविता।

बहुत रास कवि बहुत रंगक कविता
कि‍यो मोहित छल नायिकाक सुनर गालपर
कि‍यो व्यथित छल प्रेयषीक बदलल बेवहारपर
कि‍यो छलथि‍ क्रांतिक झंडा उठौने
कि‍यो रहथि‍ भ्रष्टाचारी सभकेँ भरिमन गरियौने।
अनमनस्यक भऽ कऽ हमहूँ सुनैत रहौं
कि‍यो सूतल नै माने तँए
निक-बहुत-निक करैत रहौं।

अचानक मंचपर अवतरित भेल एक नारी
जेहने देखैमे कारी
पहिरनो रहै तेहने मैल‍ साड़ी।

शुरू केलक अटकि-अटकि कऽ बाजनाइ
नै आबैत छल ओकरा शब्दक जाल बुननाइ
मुदा चेहरापर तेज छल
मनमे उत्साहक अतिरेक छल
भय नै, जँ कहि हुसब
श्रोता सभ भरिमन दूसत।

नै लय रहै ने रहै छंदक सुन्दरता
तैयो सभ प्रसन्न भऽ समवेत स्वरमे
केलथि हुनकर प्रयासक प्रशंसा।

जे कहि नै सकल शब्द
प्रयास ओकर कहलक
लागत नै कठिन
चाहे लक्ष्य हुअए किछु खास
बस राखि भरोसा अनपनापर
करी बढ़बाक सहास।